मांदर की थाप पर धड़कती परंपरा,डांटा खेल में आज भी जीवित है गांवों की आत्मा
निरंजन मोहन्ती - जशपुर/नारायणपुर
नारायणपुर 01 जनवरी 2026 : जब शहरों में आधुनिकता की चकाचौंध तेज होती जा रही है, उसी समय ग्रामीण अंचलों में आज भी मिट्टी की खुशबू, लोकसंगीत की गूंज और सामूहिक जीवन की गरिमा पूरी मजबूती से जीवित है। इन्हीं परंपराओं में से एक है डांडिया नृत्य, जिसे स्थानीय भाषा में डांटा खेल भी कहा जाता है। यह खेल केवल नृत्य या मनोरंजन नहीं, बल्कि गांव के सामाजिक ताने-बाने, एकता और आपसी सहयोग की मजबूत डोर है।
हर वर्ष धान कटाई–मिसाई के बाद, जब खेतों में लहलहाती फसल घरों तक पहुंच जाती है और किसान की मेहनत रंग लाती है, तब गांव में उत्सव का माहौल बनने लगता है। इसी खुशी को साझा करने के लिए शुरू होता है डांटा खेल। गांव के पुरुष वर्ग अपनी दिनभर की थकान भूलकर, पारंपरिक वेशभूषा में मांदर की थाप पर थिरकने लगते हैं।
15 से 20 लोगों का एक दल बनता है। मांदर जैसे ही बोल उठता है, उसकी गूंज पूरे गांव में फैल जाती है। ढोल की हर थाप मानो धरती की धड़कन बन जाती है। गीतों में खेत-खलिहान, प्रकृति, देवता और समाज की झलक मिलती है। यह दल गांव के हर घर, हर आंगन तक पहुंचता है। जैसे ही नृत्य दल किसी घर के सामने पहुंचता है, वहां के बच्चे उत्साह से दौड़ पड़ते हैं, बुजुर्ग मुस्कुराते हुए आशीर्वाद देते हैं और महिलाएं आंगन से इस लोकनृत्य को निहारती हैं।
नृत्य के बाद घर के स्वामी या सदस्य अपनी श्रद्धा, प्रेम और सामर्थ्य के अनुसार धान या धन प्रदान करते हैं। इसे स्थानीय भाषा में “जाली मांगना” कहा जाता है, लेकिन यह मांगना नहीं बल्कि आपसी सहयोग और सामाजिक सहभागिता का प्रतीक है। कोई मुट्ठी भर धान देता है, तो कोई अपनी खुशी के अनुसार राशि—हर योगदान बराबर सम्मान के साथ स्वीकार किया जाता है।
डांटा खेल की यह यात्रा लगातार 15 से 20 दिनों तक चलती है। इस दौरान पूरा गांव एक परिवार की तरह जुड़ जाता है। हर दिन मांदर की आवाज के साथ गांव की गलियां जीवंत हो उठती हैं। हंसी-मजाक, गीत-संगीत और नृत्य के बीच ग्रामीण जीवन की सादगी और अपनापन साफ झलकता है।
जब 15 से 20 दिन बाद पूरे गांव में डांटा खेल का समापन होता है, तब एकत्रित धान और धन से समस्त ग्रामवासियों के लिए सामूहिक पिकनिक का आयोजन किया जाता है। यह पिकनिक केवल भोजन का आयोजन नहीं, बल्कि गांव की सामूहिक खुशी का उत्सव होता है। एक साथ बैठकर खाना, गीत गाना, बच्चों की किलकारियां और बुजुर्गों की बातें—यह दृश्य किसी पर्व से कम नहीं होता।
इसी जीवंत परंपरा का नज़ारा कल ग्राम साहीडाँड़ में देखने को मिला। धान मंडी में मांदर की थाप पर डांटा दल ने पूरे जोश और उमंग के साथ नृत्य किया। थिरकते कदम, ताल से ताल मिलाते नृत्य दल और चारों ओर उमड़ती भीड़—हर पल ग्रामीण संस्कृति की सुंदर तस्वीर पेश कर रहा था। इसके बाद यह दल गांव की गलियों से गुजरता हुआ घर-घर पहुंचा, जहां ग्रामीणों ने खुले दिल से स्वागत किया।
आज के बदलते दौर में, जब कई परंपराएं धीरे-धीरे विलुप्त होती जा रही हैं, ऐसे में डांटा खेल यह संदेश देता है कि गांव आज भी अपनी जड़ों से जुड़े हुए हैं। यह परंपरा न केवल संस्कृति को जीवित रखती है, बल्कि नई पीढ़ी को भी अपनी मिट्टी, अपने समाज और अपने संस्कारों से जोड़ती है।
डांटा खेल सचमुच ग्रामीण जीवन की आत्मा है—जहां संगीत है, मेहनत का सम्मान है, और सबसे बढ़कर है साथ मिलकर खुशियां बांटने की भावना।
आज जब बहुत सी परंपराएं धीरे-धीरे खत्म होती जा रही हैं, ऐसे समय में डांटा खेल यह बताता है कि गांव आज भी अपनी संस्कृति और जड़ों से जुड़े हुए हैं। यह खेल सिखाता है कि खुशी अकेले नहीं, बल्कि मिलकर मनाई जाती है।डांटा खेल आज भी गांव की शान है, पहचान है और आने वाली पीढ़ियों के लिए एक अनमोल विरासत है।
देखें गांव का डांटा नृत्य